सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में राजस्थान उच्च न्यायालय के कर्मचारी भर्ती मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें सामान्य श्रेणी की सीटें सभी योग्य अभ्यर्थियों के लिए मेरिट के आधार पर खुली बताई गईं। यह फैसला आरक्षण नीति और समानता के सिद्धांत को मजबूत करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह की पीठ ने स्पष्ट किया कि “ओपन”, “अनरिजर्व्ड” या “जनरल” श्रेणी कोई कोटा नहीं, बल्कि सभी जाति, जनजाति, वर्ग या लिंग के अभ्यर्थियों के लिए उपलब्ध पदों का पूल है, जो शुद्ध मेरिट पर आधारित होता है। आरक्षित श्रेणी का कोई अभ्यर्थी यदि सामान्य श्रेणी के कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त कर ले, तो उसे सामान्य श्रेणी में ही स्थान दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह आरक्षण का लाभ नहीं बल्कि मेरिट का सिद्धांत है। अदालत ने “डबल बेनिफिट” की धारणा को खारिज करते हुए कहा कि ऐसा अभ्यर्थी आरक्षण कोटा से नहीं कटता, बल्कि मेरिट पर सामान्य श्रेणी में प्रवेश पाता है।
फैसले का महत्व
यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के समानता सिद्धांत को मजबूत करता है, क्योंकि आरक्षित अभ्यर्थी को उसकी सामाजिक श्रेणी के कारण सामान्य सीटों से वंचित नहीं किया जा सकता। भविष्य की भर्तियों, जैसे UPSC, PSC या SSC में मेरिट-आधारित चयन के लिए नजीर कायम करता है और आरक्षण नीति की गलत व्याख्या को रोकता है। इससे योग्य आरक्षित अभ्यर्थियों को न्याय मिलेगा और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी।
















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