नई दिल्ली, 30 दिसंबर 2025: सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वतमाला से संबंधित अपने हालिया फैसले पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में स्पष्टीकरण की आवश्यकता है, जिसके बाद यह निर्णय प्रभावी होगा। यह फैसला हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में खनन और निर्माण गतिविधियों पर चल रहे विवाद को नया मोड़ देता है।
फैसले पर रोक का कारण
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने अपने 20 दिसंबर के फैसले में अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और निर्माण को रोकने के निर्देश दिए थे, लेकिन अब इसे स्थगित कर दिया गया है। न्यायमूर्तियों ने कहा कि फैसले में कुछ बिंदुओं पर अस्पष्टता है, जिसके लिए सभी पक्षों से स्पष्टीकरण मांगा गया है। हरियाणा सरकार ने तत्काल स्थगन की मांग की थी, दावा करते हुए कि इससे विकास परियोजनाएं प्रभावित होंगी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और पर्यावरण संगठनों को नोटिस जारी किया।
अरावली विवाद का पृष्ठभूमि
अरावली पर्वतमाला दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र की फेफड़ों के रूप में जानी जाती है, जो प्रदूषण नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पिछले वर्षों में यहां अवैध खनन, रिसॉर्ट निर्माण और अतिक्रमण की शिकायतें बढ़ीं। 1992 के वन संरक्षण अधिनियम और पर्यावरण संरक्षण नियमों के तहत इस क्षेत्र को संरक्षित किया गया है। हालिया फैसले ने 1,100 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ‘प्राकृतिक क्षेत्र’ घोषित किया था, लेकिन अब इस पर पुनर्विचार होगा। पर्यावरणविदों ने इसे सकारात्मक कदम बताया, जबकि उद्योगपतियों ने राहत की सांस ली।
प्रमुख बिंदु और प्रभाव
खनन गतिविधियां: हरियाणा के महेंद्रगढ़ और नूह जिले में चल रहे खनन कार्य अस्थायी रूप से जारी रह सकते हैं।
निर्माण परियोजनाएं: रिसॉर्ट और आवासीय प्रोजेक्ट्स पर रोक हट गई, लेकिन सशर्त अनुमति।
पर्यावरण संतुलन: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अंतिम फैसला पारिस्थितिकी संरक्षण को प्राथमिकता देगा।
आगामी सुनवाई: जनवरी 2026 में अगली सुनवाई, जहां सभी रिपोर्ट जमा होंगी।
यह फैसला ‘ग्रीन बनाम ग्रे’ बहस को और तेज करेगा, जहां विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की चुनौती बनी हुई है।
राज्य सरकारों की प्रतिक्रिया
हरियाणा के मुख्यमंत्री ने कोर्ट के इस कदम का स्वागत किया, कहा कि इससे स्थानीय रोजगार प्रभावित नहीं होंगे। राजस्थान ने भी समर्थन जताया, जबकि गुजरात ने तटस्थ रुख अपनाया। पर्यावरण मंत्रालय ने स्पष्टीकरण रिपोर्ट तैयार करने का आश्वासन दिया। यह मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के पिछले आदेशों से जुड़ा है, जो अरावली की रक्षा पर केंद्रित हैं।
















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